Bajm
भोर के सितांचल पर, झीने बादल छा गए अश्रु जल का क्षार पी कर, स्वप्न कुछ ओंधे पड़े
तिमीर विष को छांटकर ना, स्नेह का रस उभरे ताप उर संताप जर्जर, अरविन्द तट पर विषमता के
गोल से खंजन पड़े, भर कटोरी प्रीत की पिबत गुज़री रात भर, नैंन सुख कटे नींदागोश में
पाजेब लय सी भोर दीसे, दीप सा श्रृंगार मेरा सुधि तुम्हारी हर चला, एक व्योम सा मुझे छू के गुज़रा
निशीथ पुरी मुझे लिपटे सुबह स्वप्न बाग सूना पड़ा थे सुगंधित रात के कण दिन को सब बेसुध पड़े। #बज़्म
Posted Nov 10, 2025, 12:07 PM UTC
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