क्या यही सफलता है?

​बचपन में सोचा था, लग जाएगी नौकरी तो सुकून होगा, हाथ में डिग्री होगी और हर तरफ अपना ही जुनून होगा। पर आज दफ्तर की मेजों पर, फाइलों का पहरा है, काम का बोझ इतना कि आँखों के नीचे घेरा गहरा है। दिन भर भागते हैं, फिर भी मंज़िल का पता नहीं, थक कर सो जाएँ, ऐसी कोई अब रात की रजा नहीं। ​त्योहारों की रौनक अब बस मोबाइल के स्टेटस पर दिखती है, मिठाइयों की महक भी अब बंद कमरों में सिसकती है। होली पर गुलाल नहीं, बस ईमेल का "Reply" आता है, दीवाली पर दीया नहीं, लैपटॉप का "Notification" जगमगाता है। घर की चौखट सूनी है, माँ राह तकती रह जाती है, क्या यही सफलता है, जो अपनों से ही दूर कर जाती है? ​हम आने वाले कल को सँवारने में आज को मार देते हैं, बीती हुई कड़वी यादों में, अपनी हर मु़स्कान हार देते हैं। नींद आँखों से रूठी है, बस "Target" का ही शोर है, सुकून का धागा कच्चा, और तनाव की लंबी डोर है। खुशी को कल पर टाला है, पर वो कल कभी आता नहीं, बीता हुआ लम्हा भी अब यादों के सिवा कुछ दे पाता नहीं। ​लोग कहते हैं "कामयाब हो तुम", अच्छी पगार पाते हो, पर कोई नहीं पूछता कि तुम अपनी रूह कितना जलाते हो। अगर दिल ही उदास है, तो इस ऊँचे पद का क्या मोल? जिंदगी बस सिमट कर रह गई, एक खाली डब्बे के गोल। सफलता अगर सुकून न दे, तो वो बस एक छलावा है, खुद को खोकर कुछ पाना, जीत नहीं, बस हार का दिखावा है।

Posted Mar 4, 2026, 7:23 AM UTC

10
Loading comments…