आचार्य प्रशांत " ज्ञान – झुकेगा नहीं तो रावण बनेगा" किताब से
#जो जितना बताएं कि उसे दुःख मिल रहा है, समझ लेना उतना ही उसने सुख भी भोग रखा है। दुःख पाने वाला आवश्यक नहीं है कि सहानुभूति का पात्र हो, ठीक उस तरह सुख लूटने वाला आवश्यक नहीं है कि घृणा का पात्र हो।#
जो ऊपर का सुख पा रहा है, वो अंदर का दुःख पा रहा है। ठीक उसी तरीके से ऊपर-ऊपर से जो दुखी दिख रहा है वो अंदर-ही-अंदर सुख लूट रहा है।
#तो अध्यात्म इसलिए नहीं है कि आपको दुःख से मुक्ति दे दे, अध्यात्म तब है जब दुःख-सुख के इस द्वंद्व से, इस खेल से, इस जोड़े से ही मुक्ति चाहते हो पूरी।#
जो लोग कहते हैं कि अध्यात्म इसलिए है कि दुःख से मुक्ति मिल जाएगी और हैप्पीनेस (खुशी) खूब पाएंगे, उनको बहुत सारी बाज़ारे, दुकानें चल रही हैं, वहाँ चले जाना चाहिए जहाँ हैप्पीनेस बिकती है। हैप्पीनेस के शिविर लगते हैं, हैप्पीनेस के कोर्स चलते हैं। उन्हें अध्यात्म की कोई जरूरत नहीं है, हैप्पीनेस के लिए तो बाज़ार है।
#अध्यात्म उनके लिए है जो समझ गए हैं कि सुख-दुःख की छाया मात्र है। जिन्हें समझ में आ गया कि ये खेल ही गड़बड़ है, इसमें जीत भी गड़बड़ है हार भी गड़बड़ है, इसमें सुख भी गड़बड़ है दुःख भी गड़बड़ है, अध्यात्म उनके लिए है। अपने सुखों से सावधान रहो, दुःख अपने आप छंट जाएंगे।#
Posted Apr 8, 2026, 1:16 PM UTC